जीव जगत का वर्गीकरण

⏺️सबसे पहले वर्गीकरण को अरस्तू ने प्रस्तावित किया। ये वर्गीकरण जंतुओं और पादपों के सरल आकारिकीय लक्षणों पर आधारित था।

➡️ पादपों का वर्गीकरण

1)वृक्ष
2)झाड़ी
3)शाक

➡️ जंतुओं का वर्गीकरण

रक्त के आधार पर :-

1) एनैइमा

लाल रक्तहीन जंतु।
जैसे :-स्पंज,कीट,तारा मछली आदि।

2) इनैइमा

लाल रक्त वाले जंतु।
इसके दो प्रकार है –
(I) जरायुजी :- जो शिशु को जन्म देते है , जैसे :- गाय,मनुष्य आदि।
(II) अंडजी :-जो अंडे देते है,जैसे :- सांप,छिपकली आदि।

⏺️ दो जगत वर्गीकरण

केरोलस लीनियस ने द्विजगत वर्गीकरण दिया।इस पद्धत्ति में दो जगत –
1) पादप (प्लाण्टी) :-

जीवाणु, कवक, शैवाल, लाइकेन,टेरिडोफाईटा, अनावृतबीजी, आवृतबीजी ।

2) प्राणी (एनिमेलिया) :-

सभी जंतु। प्रोटोजोआ, स्पंज, जेलीफिश, कृमि, कीट, पतंगे, मोलस्क, मेंढक, सरीसृप, पक्षी, मेमल्स आदि।

केरोलस लीनियस को वर्गीकरण का पिता माना जाता है।

⏺️ तीन जगत वर्गीकरण

अर्नेस्ट हैकल ने सजीवों को तीन जगत में विभाजित किया।
1)जंतु
2)पादप
3)प्रोटिस्टा

⏺️ चार जगत वर्गीकरण

कोपलेंड ने चार जगत बताये
1)मोनेरा
2)प्रोटिस्टा
3)प्लाण्टी
4)एनिमेलिया

⏺️ पांच जगत वर्गीकरण

आर.एच.व्हीटेकर ने पंच जगत अवधारणा प्रस्तुत की।
1)मोनेरा
2)प्रोटिस्टा
3)कवक (fungai)
4)प्लाण्टी
5)एनिमेलिया

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पांच जगत वर्गीकरण के लक्षण:-

1) कोशिका की जटिलता :-
केन्द्रक कला की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर सेल्स दो प्रकार की होती है :- युकैरियोटिक व प्रोकैरियोटिक।

2)जीवों की जटिलता :-
जीव दो प्रकार के होते है –
एककोशिकीय और बहुकोशिकीय।

3)पोषण प्राप्त करने की विधि :-
पौधों और जंतुओं में अलग – अलग विधियां होती है –
I) स्वपोषी :-जो जीव अकार्बनिक पदार्थो का प्रयोग करके कार्बनिक पदार्थ अर्थात भोजन का निर्माण करते है,स्वपोषी कहलाते है।
II)परपोषी :- जो जीव दूसरे जीवो (पौधों और जंतुओं)से अपना पोषण प्राप्त करते है,उन्हें परपोषी कहते है।
जैसे :-
(a)जंतुसम पोषण(holozoic) :- जब जंतु ठोस पदार्थ खाकर उनका पाचन शरीर के अंदर करते है।जैसे :- प्रोटोजोआ
(b)मृतोपजीवी अवशोषी :- जो जीव अपना पोषण मृत और सड़े गले पदार्थो से प्राप्त करते है,अपघटन कला या मृतोपजीवी या saprobes कहलाते है।जैसे :- कवक।

4)पारिस्थितिक भूमिका :-
किसी जाति का विकासात्मक इतिहास ,जातिवृत(phylogeny) कहलाता है।आधुनिक वर्गीकरण में इसका बहुत ज्यादा महत्व है।